Friday, September 12, 2008

ghazal


आरजुओं को सजाओ, मै ग़ज़ल कहता हूँ !
फूल चुनना है तो आओ, मै ग़ज़ल कहता हूँ!

-------महमूद जकी



Sunday, September 7, 2008

सच



अब तो सच्ची बात कहने से भी घबराते हैं लोग

क्या हुई जाती है दुनिया क्या हुए जाते है लोंग

-----------महमूद जकी


Saturday, September 6, 2008

इंतज़ार

उस इन्कलाब का जो इक करीब की पुकार है

तुम्हे भी इन्तेज़ार है, मुझे भी इंतज़ार है

ऐ सुस्त-सुस्त रहबरों ! तुम्हे यकीन हो न हो

मगर मुझे तो अपने होसलों पे एतेबार है

गमे-जहाँ की वादियों में होसले से काम ले

यहाँ न तेरा दोस्त है न कोई गमगुसार है

वो देखिये दिलों की रौशनी में कांपने लगा

नज़र के सामने जो मुश्किलात का गुबार है

जकी अभी सियासत-ऐ-गमे जहाँ के साये में

वफायें सोगवार हैं खुलूस अश्कबार है


-------महमूद जकी




Thursday, September 4, 2008

बढ़ते हुए क़दम




रुकने न पायें साथियों ! बढ़ते हुए क़दम

फिर इन्कलाब लायेंगे इस ज़िन्दगी में हम

ये क्या घुट रहा हो कहीं ज़िन्दगी का दम

कहने को फिर भी आम है सब पर तेरा करम

आओ कि पहले वक्त के गेसू सवांर ले

फिर उस के बाद देखेंग जुल्फों के पेच ओ ख़म

ये और बात है कि मयस्सर न हो सुकून

हासिल नहीं हयात का ऐ दोस्त ! सिर्फ़ ग़म

अहल ऐ नज़र के सामने तफरीक कुछ नहीं

तेरा ही अक्स पाते हैं देर ओ हरम में हम

छोड़ो के ख़ाक लुत्फ़ मिलेगा शराब में

अब महफिले निशात म साकी न जामे जम

दुनिया को दे रहें हैं नया सोचने का ढंग

और क्या काम लेते जकी शायरी से हम

---------महमूद जकी

Monday, September 1, 2008

मीडिया और बिहार बाढ़


ख़बरों की अहमियत को समझना भी अब ख़बर वाले भूल गए है । बात है २८ अगस्त २००८ की जब एक और देश के प्रधानमंत्री बिहार में आई बाढ़ और उससे हो रहे विनाश को राष्ट्रीय आपदा मान रहे थे। तो दूसरी तरफ़ लगभग सभी समाचार चैनल चला रहे थे ख़बर उस एक व्यक्ति की जो खेल से जुडा है। माना कि समाचार चैनलों को बाजारवाद के इस दौर में उद्योगजगत के साथ हाथ मिलकर चलना होता है लेकिन इतनी भी क्या बेहिसी कि राष्ट्रीय आपदा के वक्त में भी केवल उस ख़बर को विशेष रूप से चलाया जा रहा है जिससे जुडा है कई कंपनियों का ब्रांड अम्बस्डोर।

भूल जाते है वातानुकूलित समाचार कमरों में बैठे लोग की मौत का वह खोफनाक मंज़र कितना दिल दहलाने वाला होता होगा जब चारों तरफ़ सिर्फ़ और सिर्फ़ पानी ही नज़र आए। किसी एक व्यक्ति की कामयाबी की ख़बर चलाते वक्त कुछ उन लोगों के बारे में भी सोच ले जो पल पल जल के इस महाप्रलय का सामना करते हुए अपनी जान से हाथ धो रहे हैं और जिनको अपने आस पास सिर्फ़ मौत ही मौत दिखाई दे रही हो। मेहेरबानी करके एक बार उनकी तरफ़ भी देख लें जो अपना सब कुछ कोसी और गंगा की भेंट चढा चुके हैं या जो पिछले कई दिनों से अन का एक दाना भी अपने मुह में नही दाल सके हों। जो अपने सामने ही अपने सपनो की डोर को टूटते हुए देख रहे हों।

अपना फायदा हर कोई चाहता है। इसमे किसी को कोई आपत्ति भी नही होनी चाहिए, यह बिल्कुल स्वाभाविक है लेकिन अपने फायदे में दूसरो के दर्द को भूल जन इंसानियत के ख़िलाफ़ किया गया अपराध हे जिसे माफ़ किया जन इंसानियत पैर किए गए ज़ुल्म के बराबर है।

हेरानी की बात है कि १८ अगस्त को कोसी के बाँध में दरार पड़ने से बिहार में बाढ़ की स्तिथि भयानक रूप ले ली। हम सब ही जानते है कि हमारे देश और विशेष रूप से बिहार कि सरकार को अपनी ज़िम्मेदारी निभाना कितना आता है। बाढ़ ने महाप्रलय का रूप धारण कर लिया उसके बाद भी राज के मुखिया को केन्द्र से मदद मांगने में दस दिन लग गए। उससे पहले तक सिर्फ़ खोखली बयानबाजी से ही काम चलाते रहे। इस बार केन्द्र के रुख की सरहाना करनी होगी, क्यूंकि केंद्रीय मंत्री ने चाहे वह बिहार के ही क्यूँ न हों हवाई सर्वेक्षण करके स्तिथि कि गंभीरता को समझते हुए प्रधानमन्त्री के पास पहुँच कर दौरा करने और मदद का आग्रह करने पहल की और फिर प्रधानमन्त्री ने भी स्तिथि की नजाकत को समझते हुए मांग से ज़्यादा उदारता दिखाई।

इस सब घटना क्रममें देश का ससे तेज़ चलने वाला मीडिया क्यों पीछे रहा और खामोशी बनाये रखा समझ से परे है। बिहार और बिहार के सभी मंत्रियों और सरकारोंकि हर समय ख़बर रखने वाला मीडिया विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस बार किस तरह चूंक गया और इतनी भयानक हो चुकी स्तिथि को नज़रान्दाज़ कर गया हेरानी की बात है।

Friday, August 22, 2008

खेल




क्या हमारे खिलाड़ियों के ओलंम्पिक में हुए प्रदर्शन से हमें वाकई खुश होना चाहिए ? कभी लगता है क्या इतने विशाल और महान मुल्क के नागरिकों को इतनी सी कामयाबी पर इतना खुश होना चाहिए जितना हम लोग हुए हैं? मुझे लगता है हमे होना चाहिए क्यों कि खुशी तो सिर्फ़ खुशी होती है छोटी और बड़ी कर के उसकी अहमियत को कम करना उस खुशी देने वाले के साथ जियादती है।

अजीब नही लगता है हम अपनी कमजोरियों को किस तरह से शब्दों के जाल में घुमा कर छुपा लेने कि कोशिश करते हैं। अरे ज़रा सोचो तो इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी आबादी और हम इतिहास रचने की बात कर रहे हैं कि हमने पहला व्यक्तिगत सुवर्ण पदक जीता या इस बार तो हम कुल मिलाकर तीन पदक जीत लिए हैं।

हम से कई मामलों में पीछे रहने वाले मुल्क हम से आगे हैं खेल कि दुनिया में। ज़्यादा परेशां करने वाली बात यह है कि हम अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी में क्वालीफाई तक नही कर सके। कहाँ है हमारे देश कि संस्कृति को बचाने का दावा करने और स्वादशवाद का नारा देने वाली पार्टियाँ ? यहाँ खामोश क्यूँ हैं देश के इस और उसकी धरोहर के इस हाल पर ? मेरा मानना है के जिस तरह से हमे हमारे राष्ट्र का सम्मान प्यारा है वैसे ही हमे हमारी सभी राष्ट्रीय पहचानो से भी प्यार होना चाहिए। सम्मान जिस तरह राष्ट्रीय प्रतिक राष्ट्र ध्वज का है वैसा ही सम्मान राष्ट्रीय गीत, भाषा,खेल और पक्षी का होना चाहिए।

जहाँ एक और हम राष्ट्र गीत और राष्ट्र ध्वज के लिए लड़ मर रहे हैं वहीँ दूसरी और राष्तिर्ये खेल कि इतनी उपेक्षा क्यूँ?

सोचना चाहिए........... सोचना होगा ............... सोचिये


Wednesday, August 20, 2008

विश्वास अल्लाह पर


ज़िन्दगी में हादसे बड़ी तबदीली का सबब बन जाते हैं। मै छोटा सही लेकिन तजुर्बों और बड़ों के ऐतिमाद ने मुझे कभी छोटा रहने नही दिया। इस बार भी एक हादसा हुआ। सबको सामना करना था। किया एक बार फिर सब ने ऐतिमाद और चला मैं एक नए तजुर्बे के लिए। लगा कामयाबी मिल रही है। मिली भी देख कर विश्वास उनका जो हादसे का शिकार हैं। बहुत अपने। करीबी। मनो तो मेरा ही हिस्सा हैं । करी हिम्मत। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सोच लिया के तजुर्बों मेंकामायाबी और नाकामयाबी दोनों का सामना करना पड़ सकता है। ज़िम्मेदारी जहाँ अच्छाई देती है वहीँ बुराई भी। खेर मुझे इस काम में अच्छाई और बुराई की परवाह भी नही है। मकसद एक बहन की खुशी और उसकी ज़िन्दगी। इस बार भी दिमागी तोर पर तो कामयाबी और नाकामयाबी दोनों के लिए तैयार हो कर शुरू किया पर इस बार नाकामयाबी के मानी बहुत ही खतरनाक दिख रहे थे। देखें इस बार क्या मिलता है। इंसान हूँ फ़रिश्ता नही। लेकिन दुआएं मेरे और मुझसे जुड़े लोगों के साथ। शुक्रिया उन सबका जो इस जदोजहद में साथ हैं। शुक्रिया उनका भी जो दुआ के ज़रिये इस मकसद से जुड़े। खुदा जल्द हिरासत को रिहाई में बदले। आमीन।