
देहली वाले बारिश से बेहाल हुए
उनके चहरे घुस्से से कैसे लाल हुए
क्या कर रही ही हुकूमत drainage सिस्टम का
अब तो संसद में भी यह सवाल हुए
duniya ko dekhne ka apna andaaz
Menhagaee ke mudde per sansad nahi chali
सभी बहार-ऐ-इश्क लाज़वाल कहते आए हैंबगैर इश्क ज़िन्दगी वबाल कहते आए हैं
मुझे गुरुर-ऐ-ज़ब्त-ऐ-ग़म नही मगर ये अहले दिल
इन आँसूओं का रोकना कमाल कहते आए हैं
बकैद-ऐ-रस्म-ऐ-आशिकी ब-पास-ऐ-अजमत-ऐ-वफ़ा
नज़र-नज़र से अपने ग़म का हाल कहते आए हैं
जुनू जिसे समझ गया , मगर न अक्ल पा सकी
वह इस तरह भी किस्सा-ऐ-जमाल कहते आए हैं
कशाकश-ऐ-हयात ही तो लज्ज़त-ऐ-फिराक है
इसी लिए तो मौत को विसाल कहते आए हैं
मुझे नही है आरजू विसाल-ऐ-यार की जकी
विसाल को तो इश्क का ज़वाल कहते आए हैं
-------महमूद जकी
जिनेवा में हुए महाप्रयोग की सफलता ने एक बार फिर मीडिया और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कलाई खोल कर रख दी है। मीडिया अपनी टी आर पी की दौड़ में कितना अँधा हो गया है इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है कि इसके द्वारा फेलाए जा रहे भ्रम की वजह से एक मासूम बच्ची ने अपना अनमोल जीवन गवां दिया।
उस इन्कलाब का जो इक करीब की पुकार है तुम्हे भी इन्तेज़ार है, मुझे भी इंतज़ार है
ऐ सुस्त-सुस्त रहबरों ! तुम्हे यकीन हो न हो
मगर मुझे तो अपने होसलों पे एतेबार है
गमे-जहाँ की वादियों में होसले से काम ले
यहाँ न तेरा दोस्त है न कोई गमगुसार है
वो देखिये दिलों की रौशनी में कांपने लगा
नज़र के सामने जो मुश्किलात का गुबार है
जकी अभी सियासत-ऐ-गमे जहाँ के साये में
वफायें सोगवार हैं खुलूस अश्कबार है
-------महमूद जकी

रुकने न पायें साथियों ! बढ़ते हुए क़दम
फिर इन्कलाब लायेंगे इस ज़िन्दगी में हम
ये क्या घुट रहा हो कहीं ज़िन्दगी का दम
कहने को फिर भी आम है सब पर तेरा करम
आओ कि पहले वक्त के गेसू सवांर ले
फिर उस के बाद देखेंग जुल्फों के पेच ओ ख़म
ये और बात है कि मयस्सर न हो सुकून
हासिल नहीं हयात का ऐ दोस्त ! सिर्फ़ ग़म
अहल ऐ नज़र के सामने तफरीक कुछ नहीं
तेरा ही अक्स पाते हैं देर ओ हरम में हम
छोड़ो के ख़ाक लुत्फ़ मिलेगा शराब में
अब महफिले निशात म साकी न जामे जम
दुनिया को दे रहें हैं नया सोचने का ढंग
और क्या काम लेते जकी शायरी से हम
---------महमूद जकी


